Chidambra Sumitranandan Pant

ISBN: 9788126704910

Published: 2008

Hardcover

353 pages


Description

Chidambra  by  Sumitranandan Pant

Chidambra by Sumitranandan Pant
2008 | Hardcover | PDF, EPUB, FB2, DjVu, talking book, mp3, RTF | 353 pages | ISBN: 9788126704910 | 9.38 Mb

‘‘चिदंबरा मेरी कावयचेतना के दवितीय उतथान की परिचायिका है, उसमें युगवाणी से लेकर अतिमा तक की रचनाओं का संचयन है-सन ’37 से 57 तक परायः बीस वरषों की विकास-शरेणी का विसतार।‘‘चिदंबरा की पृथु-आकृति में मेरी भौतिक, सामाजिक, मानसिक, आधयातमिक संचरणों से पMore‘‘चिदंबरा मेरी काव्यचेतना के द्वितीय उत्थान की परिचायिका है, उसमें युगवाणी से लेकर अतिमा तक की रचनाओं का संचयन है-सन् ’37 से 57 तक प्रायः बीस वर्षों की विकास-श्रेणी का विस्तार।‘‘चिदंबरा की पृथु-आकृति में मेरी भौतिक, सामाजिक, मानसिक, आध्यात्मिक संचरणों से प्रेरित कृतियों को एक स्थान पर एकत्रित देखकर पाठकों को उनके भीतर व्याप्त एकता के सूत्रों को समझने में अधिक सहायता मिल सकेगी।इसमें मैंने अपनी सीमाओं के भीतर, अपने युग के बहिरंतर के जीवन तथा चैतन्य को, नवीन मानवता की कल्पना से मण्डित कर, वाणी देने का प्रयत्न किया है। मेरी दृष्टि में युगवाणी से लेकर वाणी तक मेरी काव्य-चेतना का एक ही संचरण है, जिसके भीतर भौतिक और आध्यात्मिक चरणों की सार्थकता, द्विपद मानव की प्रकृति के लिए सदैव ही अनिवार्य रुप से रहेगी।‘‘पाठक देखेंगे कि (इन रचनाओं में) मैंने भौतिक-आध्यात्मिक, दोनों दर्शनों से जीवनोपयोगी तत्वों को लेकर, जड़-चेतन सम्बन्धी एकांगी दृष्टिकोण का परित्याग कर, व्यापक सक्रिय सामंजस्य के धरातल पर, नवीन लोक जीवन के रूप में, भरे-पूरे मनुष्यत्व अथवा मानवता का निर्माण करने का प्रयत्न किया है, जो इस युग की सर्वोपरि आवश्यकता है?



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